Why Sunday is a Holiday in Hindi | क्यों होती है रविवार को ही छुटटी |

क्यों होती है रविवार को ही छुटटी, जानिए पूरा सच, why Sunday is a holiday in hindi

दोस्तों, रविवार सबको बेहद पसंद है क्योकि इस दिन कोई अपनी फैमिली के साथ समय बीतता है तो कोई आउटिंग के लिए जाता है। ये ऐसा दिन है जिस दिन का सभी को बेसब्री से इंतज़ार रहता है क्योकि हफ्ते भर काम करने के बाद यही एक ऐसा दिन होता है जो हम अपनी मर्जी से बिताते है स्ट्रेस से दूर रहने के लिए कुछ लोग घरों में अपने परिवार के साथ अपना समय बिताते है। मजे की बात तो ये है बच्चे संडे का इसलिए इंतज़ार करते है ताकि को खूब खेल सके। उनके लिए संडे मतलब मस्ती का दिन, पर ये छुट्टी रविवार को ही क्यों होती है किसी और दिन क्यों नहीं क्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया है। अगर आपको इसके पीछे का कारण नहीं पता तो आज हम आपको इसके पीछे की वजह बताये। तो आईये जानते है इसके पीछे की कहानी:- why Sunday is a holiday in hindi

आजादी से पहले की बात है जब भारत अंग्रेजी शासन की हुकुमत का गुलाम था। लगभग सभी को पता होगा कि 1947 को भारत को आजादी मिली। और उस समय से पहले लोगों को पूरे हफ्ते काम करना पड़ता था और उन मजदूरों को न तो अपने परिवार वालो से और न ही किसी और से मिलने का समय मिलता था बस उनकी ज़िंदगी में काम और तनाव के आलावा कुछ न था। यहां तक कि काम के दोहरान उन्हें ठीक ढंग से खाने का भी समय नहीं मिलता था। अगर कोई मजदूर काम के समय थोड़ा सा भी आराम करता तो उससे डबल काम करवाया जाता था।

काम में गर्भवती महिलाओं को भी कोई छूट नहीं दी जाती थी उन्हें भी उतना काम करना पढ़ता जितना दूसरे लोग करते थे ऐसे में कई क्षेत्रों में तो मजदूरों की स्थिति बेहद खस्ता होने लगी। आखिर कब तक लोग इस तरह के नियम का पालन करते बस उन मजदूरों में से कुछ इसलिए नहीं बोलते कि जो थोड़ा बहुत पेट पालने के लिए काम मिल रहा है वो भी बंद हो जाएगा।

नारायण लोखंडे ने उठाई आवाज़

1). पुणे जिले कन्हेरसर में रहने वाले लोखंडे ने मजदूरों की स्थिति को जानने का प्रयास किया उन्होंने देखा कि मजदूर दिन रात काम में लगे हुए है और कुछ लोग तो शफ्टों में काम कर रहे है दिन भर काम करने के बाद मजदूरों को आराम न मिलने के वजह से उनकी हालत खराब होती जा रही थी और  फिर लोखंडे ने अंग्रेजों के सहमने मजदूरों के लिए एक दिन के अवकाश का प्रस्ताव रखा ताकि मजदूर लोग एक दिन आराम कर सके और अपने परिवार वालो के साथ भी समय बीता सके। पर अंग्रेजी हकुमत यह मानने को तैयार नहीं थी।

2). लोखंडे का प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे अपने साथ मजदूरों को जोड़ना शुरू किया और उस प्रस्ताव में मजदूरों के हितों के लिए कुछ और मांगे भी थी जैसे कि मजदूरों के काम करने के घंटे निश्चित होने चाहिए, काम के दौरान चोट लगने पर किसी के वेतन में कटौती न हो और काम के दौरान किसी दुर्घटना की वजह से किसी मजदूर की मृत्यु हो जाए तो उसके लिए पेंशन देना आदि।

3.) नारायण लोखंडे ने एक याचिका के तहत 5000 से ऊपर की संख्या में मजदूरों के हस्ताक्षर करवाए और उसी दौरान मजदूरों द्वारा अपने नेता लोखंडे का साथ देने पर मिल मालिकों ने विरोध करना शुरू कर दिया, उनके दुगना काम करवाया जाने लगा, यह तक की छोटे छोटे बच्चों को भी जबरन काम में थकेल दिया गया।

4). मजदूरों पर कई तरह के जुर्म हुए परन्तु ये आवाज़ दबने वाली न थी इसी बीच लोखंडे ने आंदोलन कर दिया इसमें सभी मजदूरों, महिलाओ ने अपना योगदान दिया आखिरकार लम्बे संघर्ष के बाद शासन की नीव कामजोर होने लगी और मजदूरों के काम को इंकार करने से व्यापार पर भी गहरा प्रभाव पड़ने लगा। धीरे धीरे मजदूरों के काम न करने पर बड़ी बड़ी फैक्टरियां बंद होने लगी।

5). आखिरकार 10 जून 1890 को अंग्रेजी शासन ने इस पर मोहर लगाई और इस तरह 7 सालों के लम्बे संघर्ष के बाद नारायण मेघाजी लोखंडे और मजदूरों के प्रयास की जंग रंग लाई और तभी भारत को रविवार का अवकाश मिला।

इस प्रकार लोखंडे जैसे महान व्यक्ति ने मजदूरों के विरुद्ध आवाज़ उठाकर अंग्रेजो से ये अवकाश माँगा ताकि मजदूर लोग अपने परिवार के साथ समय बिता सकते और आराम कर सके।

 

 

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