दोस्तों, रविवार का दिन हर किसी का पसंदीदा होता है। कोई इस दिन अपने परिवार के साथ समय बिताता है, तो कोई दोस्तों के साथ बाहर घूमने जाता है। हफ्ते भर की भागदौड़ और काम के बाद यही एक दिन होता है जब हम बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से जी सकते हैं।
कई लोग इस दिन घर पर आराम करना पसंद करते हैं, जबकि बच्चे रविवार का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं क्योंकि उनके लिए यह दिन सिर्फ खेलने और मस्ती करने का होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि छुट्टी सिर्फ रविवार को ही क्यों होती है? कोई और दिन क्यों नहीं? अगर आपके मन में भी यह सवाल है, तो आज हम आपको इसके पीछे की दिलचस्प कहानी बताएंगे।
आज़ादी से पहले की स्थिति
यह कहानी उस समय की है जब भारत अंग्रेजों के शासन में था। उस दौर में मजदूरों की जिंदगी बेहद कठिन थी। उन्हें पूरे सप्ताह बिना किसी छुट्टी के काम करना पड़ता था। उनके पास न परिवार के लिए समय होता था और न ही आराम के लिए।
इतना ही नहीं, काम के दौरान उन्हें ठीक से खाना खाने का भी समय नहीं मिलता था। अगर कोई मजदूर थोड़ी देर भी आराम करता, तो उसे सजा के तौर पर और ज्यादा काम करना पड़ता था।
मजदूरों की कठिन हालत
स्थिति इतनी खराब थी कि गर्भवती महिलाओं को भी कोई राहत नहीं दी जाती थी। उन्हें भी उतना ही काम करना पड़ता था जितना बाकी मजदूर करते थे। धीरे-धीरे हालात इतने बिगड़ गए कि मजदूरों की सेहत और जीवन दोनों पर बुरा असर पड़ने लगा।
लेकिन डर के कारण कई मजदूर आवाज़ नहीं उठा पाते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने विरोध किया तो उनकी नौकरी भी छिन सकती है।
नारायण मेघाजी लोखंडे की पहल
इसी कठिन समय में एक व्यक्ति मजदूरों के हक के लिए आगे आया—नारायण मेघाजी लोखंडे।
मजदूरों की आवाज़ बने
लोखंडे ने मजदूरों की हालत को समझा और अंग्रेज सरकार के सामने सप्ताह में एक दिन छुट्टी देने की मांग रखी, ताकि मजदूर आराम कर सकें और अपने परिवार के साथ समय बिता सकें। लेकिन शुरुआत में उनकी इस मांग को ठुकरा दिया गया।
हार नहीं मानी
इसके बाद भी लोखंडे ने हार नहीं मानी। उन्होंने मजदूरों को एकजुट करना शुरू किया और उनकी मांगों को और मजबूत किया, जैसे:
- काम के घंटे तय किए जाएं
- चोट लगने पर वेतन न काटा जाए
- दुर्घटना में मृत्यु होने पर परिवार को सहायता मिले
संघर्ष और आंदोलन
लोखंडे ने 5000 से ज्यादा मजदूरों के हस्ताक्षर के साथ एक याचिका तैयार की। मजदूरों ने उनका पूरा साथ दिया, जिससे अंग्रेजी हुकूमत और मिल मालिकों पर दबाव बढ़ने लगा।
हालांकि, इसके जवाब में मजदूरों पर अत्याचार और बढ़ा दिए गए। उनसे ज्यादा काम करवाया जाने लगा और यहां तक कि छोटे बच्चों को भी जबरन काम पर लगाया जाने लगा।
लेकिन इस बार मजदूर चुप नहीं बैठे। उन्होंने लोखंडे के साथ मिलकर आंदोलन शुरू कर दिया, जिसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी हिस्सा लिया।
आखिरकार मिली सफलता
लगातार संघर्ष और एकजुटता के कारण अंग्रेजी शासन को झुकना पड़ा।
10 जून 1890 को रविवार को साप्ताहिक अवकाश घोषित कर दिया गया।
यह जीत आसान नहीं थी—इसके पीछे 7 सालों का लंबा संघर्ष और हजारों मजदूरों की मेहनत थी।
निष्कर्ष
आज हम जिस रविवार की छुट्टी का आनंद लेते हैं, वह हमें यूं ही नहीं मिली है। इसके पीछे नारायण मेघाजी लोखंडे और मजदूरों का संघर्ष छिपा है।
इसलिए अगली बार जब आप रविवार को आराम करें या परिवार के साथ समय बिताएं, तो इस इतिहास को जरूर याद करें।
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