दिवाली का नाम सुनते ही आँखों के सामने रोशनी, रंग-बिरंगी सजावट और खुशियों से भरा माहौल आ जाता है। यह ऐसा त्योहार है जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आता है। दिवाली सिर्फ हिंदू धर्म का ही नहीं, बल्कि सिख और जैन धर्म के लोगों के लिए भी विशेष महत्व रखती है।
समाज में दिवाली को लेकर कई मान्यताएँ और कहानियाँ प्रचलित हैं। आइए जानते हैं आखिर हम दिवाली क्यों मनाते हैं और इसके पीछे क्या कारण हैं।
पांडवों की वापसी
महाभारत के अनुसार, कार्तिक अमावस्या के दिन ही पांडव 13 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास पूरा करके वापस लौटे थे। उनके लौटने की खुशी में लोगों ने अपने घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया। तभी से दीप जलाने की परंपरा शुरू हुई।
सिख धर्म में बंदी छोड़ दिवस
सिख धर्म में दिवाली को “बंदी छोड़ दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
इतिहास के अनुसार, मुगल बादशाह जहांगीर ने सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी को ग्वालियर के किले में कैद कर लिया था। उसी किले में 52 अन्य हिंदू राजा भी बंदी थे।
जब जहांगीर की तबीयत बिगड़ने लगी, तो उसे सलाह दी गई कि एक सच्चे गुरु को कैद करने के कारण ऐसा हो रहा है। इसके बाद उसने गुरु हरगोविंद साहिब जी को रिहा करने का आदेश दिया।
लेकिन गुरु जी ने अकेले रिहा होने से मना कर दिया और कहा कि वे तभी बाहर आएंगे जब सभी बंदी राजाओं को भी रिहा किया जाएगा। अंततः एक विशेष वस्त्र के माध्यम से सभी 52 राजाओं को उनके साथ रिहा किया गया।
उनकी रिहाई की खुशी में लोगों ने दीप जलाए और तभी से यह दिन “बंदी छोड़ दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा।
भगवान राम की अयोध्या वापसी
दिवाली का सबसे प्रसिद्ध कारण भगवान राम की अयोध्या वापसी है।
मान्यता है कि भगवान राम 14 वर्ष का वनवास पूरा करके और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में पूरी अयोध्या नगरी को दीपों से सजाया गया था।
तभी से हर साल इस दिन दीप जलाकर इस खुशी को मनाया जाता है।
मां लक्ष्मी का प्रकट होना
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक अमावस्या के दिन समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इसलिए इस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है और समृद्धि की कामना की जाती है।
नरकासुर का वध
दिवाली से एक दिन पहले भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और कई महिलाओं को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इस विजय की खुशी में भी दिवाली का त्योहार मनाया जाता है।
राजा विक्रमादित्य का राजतिलक
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य का राजतिलक दिवाली के दिन ही हुआ था। उनकी न्यायप्रियता और महानता के कारण लोग इस दिन को उत्सव के रूप में मनाते हैं।
जैन धर्म में दिवाली का महत्व
दिवाली जैन धर्म के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
इस अवसर पर जैन समुदाय त्याग, तपस्या और आत्मशुद्धि का संदेश देता है और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
निष्कर्ष
दिवाली केवल रोशनी और पटाखों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह अच्छाई की बुराई पर जीत, सच्चाई, त्याग और एकता का प्रतीक है। अलग-अलग धर्मों और परंपराओं में इसके अलग-अलग कारण हैं, लेकिन हर जगह इसका उद्देश्य खुशी, प्रकाश और सकारात्मकता फैलाना है।
