Kabir Das ke Dohe in Hindi with Meaning | Awesomegyani

Kabir Das ke Dohe in Hindi with meaning, कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे भाव सहित

कबीर दास जी एक प्रसिद्ध कवी और संत थे। उनके विचार और लेखन ने हिन्दू भक्ति आंदोलन पर काफी प्रभाव डाला। उनके विचार और लेखन का ज़िक्र गुरु ग्रन्थ साहिब में भी है। कबीर ने बताया कि सच उसी के साथ है जो सच्चाई के मार्ग पर चलता है। वो पृथ्वी के सभी जीव जंतुओं को अपना समझते थे। आइये आज कबीर जी के प्रसिद्ध दोहे के बारे में पढ़तें हैं।

Kabir Das ke Dohe in Hindi

गुरू गोविन्द दोऊ खङे का के लागु पाँव।
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय ।।

अर्थ : संत कबीर जी कहते हैं कि गुरू और गोबिंद अर्थात शिक्षक और भगवान जब दोनों एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को ?
उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना ही उत्तम है क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक जाने का रास्ता बताया है अर्थात गुरु की कृपा से ही भगवान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

Kabir Das ke Dohe

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ : इस दोहे के माध्यम से कबीर कहते कि जब मैं इस संसार में बुराई खोजने के लिए  निकला तो मुझे कोई बुरा दिखाई न दिया और जब मैंने मनरुपी द्वार अर्थात अपने हृदय में झाँककर देखा तो मुझे प्रतीत हुआ कि मुझसे बुरा तो इसमें कोई है ही नहीं।

Kabir Das Dohe with meaning in Hindi

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ : कबीर जी कहते हैं कि हमे एक छोटे से तिनके की भी निंदा नही करनी चाहिए जो हमारे पांवों के नीचे दब जाता है। क्योकि अगर वही तिनका उड़ते हुए हमारी आँख में पड़ जाये तो बहुत गहरी पीड़ा पहुँचता है।

Kabir ji ke dohe

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौल‍ि के, तब मुख बाहर आनि।।

अर्थ : कबीर जी कहते है कि सही तरीके से बोलने वाला इंसान जानता है कि वाणी कितना अनमोल रत्न है इसलिए वह पहले वाणी को अपने हृदय रुपी तरुजू में तोलता है और फिर मुँह से बाहर निकालता है।

Kabir dohe in hindi

दोस पराए देख‍ि करि, चला हसंत हसंत।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।।

अर्थ : महान कवि कबीर जी कहते है कि मनुष्य का ऐसा स्वभाव है कि दूसरों में दोष देखकर वह बहुत खुश होता है और उन पर हँसता है और अपने दोष उसे याद नहीं आते इनका कोई अंत ही नहीं है।

Dohe Kabir Das

Kabir Das ke Dohe in Hindi with Meaning

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहिं सुजान।

अर्थ : इस दोहे से कबीर कहना चाहते है कि पेड़ अपना फल खुद नहीं खाते और न ही तालाब अपना पानी खुद पीते है और सज्जन व्यक्ति वही है जो दूसरों की भलाई के लिए अपनी संपत्ति को संचित करता है।

Kabir ji ke dohe

बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोले बोल।
‘रहिमन’ हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल॥

अर्थ : कबीर जी का कहना है कि जो लोग सच में बड़े होते है वो कभी अपनी बड़ाई नहीं किया करते और न ही अपने मुँह से बड़े बड़े बोल बोलते है वे कहते है कि हीरा कब कहता है कि उनका मोल लाख टके का है।

Dohe Kabir Ke

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ : कबीर जी का कहना है कि मन में धीरज होना अति आवश्यक है क्योकि सब्र रखने से ही सब कुछ संभव होता है अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे। तब भी फल तो ऋतू आने पर ही होगा।

Kabir ke dohe in hindi

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ : कबीर जी कहते है कि हमे किसी साधु सज्जन की जाति के बारे न पूछ कर उसके ज्ञान को पहचाने का प्रयास करना चाहिए क्योकि मूल्य तो तलवार का होता है न की उसकी म्यान का।

Sant kabir ke dohe

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिर पछ्ताओगे, प्राण जाहि जब छूट ॥

अर्थ : कबीरदास जी कहते है भगवान का नाम जितना चाहो ले लो नहीं तो मृत्यु के बाद पछताओगे कि हमने भगवान के नाम का जाप क्यों नहीं किया।

Kabir ke dohe in hindi

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

अर्थ : कबीर जी कहते है कि हे भगवान मुझे इतना दो कि जिसमे मेरा गुजारा चल जाए और मेरे द्वार पर कोई आया साधू भी भूखा न जाए। कहने का भाव है कि मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और घर पर आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।

Kabir das dohe bhav sahit

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥

अर्थ : संत कबीर कहते है कि इस संसार में हमारा कोई भी नहीं है और ना ही हम किसी के, जिस तरह नाव में बैठे यात्री साथ सफर करके भी बिछुड़ जाते है उसी तरह हम भी सबसे एक दिन बिछुड़ जायेगे और सब सांसारिक बंधन यही रह जाएंगे।

Kabir dohe with meaning in hindi

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ : संत कबीर जी कहता है कि जो पाने के लिए प्रयत्न करते है वो कुछ न कुछ पा ही लेते है जिस तरह मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाकर कुछ न कुछ लेकर ही आता है। पर कुछ बेचारे व्यक्ति भय के डर से किनारे पर भी बैठे रह जाते है। और उन्हें कुछ हासिल नहीं होता।

Kabir Das ke Dohe

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ :  इस दोहे के माध्यम से कबीर कहते है कि न तो जरूरत से ज्यादा बोलना ही ठीक है और न ही ज्यादा चुप रहना। जैसे बहुत अधिक बरसात भी ठीक नहीं और न बहुत ज्यादा धूप।

Kabir dohe with meaning

कस्तूरी कुंडल बसे,मृग ढूँढत बन माही।
ज्योज्यो घट– घट राम है,दुनिया देखें नाही ।।

अर्थ : संत कबीर जी परम् ईश्वर की महत्ता बताते हुए कहते है कि हिरन को कस्तूरी की खुशबू तो उसकी नाभि से आती है और वह उसे बाहर जंगलों में ढूंढ़ता फिरता है उसी तरह भगवान् तो मनुष्य के हृदय में निवास करता है और अनजान मनुष्य इसे मंदिर, मस्जिद, और तीर्थस्थानों में ढूँढता फिरता है ।

Kabir ji ke dohe in hindi

Kabir Das Dohe in Hindi

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥

अर्थ : इनमे कबीर जी ने समय की महत्ता की ओर इशारा करते हुए कहा है कि जो काम कल करना है उसे आज ही पूरा कर लो और जो आज करना है उस काम को अभी पूरा करो क्योकि जब कल जीवन ही समाप्त हो गया तो फिर कुछ नहीं कर पाओगे।

Sant kabir ke dohe

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

अर्थ : कबीर जी ने कहा है कि दुःख ने तो सब भगवान को याद करते है जबकि सुख के समय कोई याद नहीं करता उनका कहना है कि अगर व्यक्ति सुख में भी उस परम् परमात्मा का सिमरन करे तो दुःख हो ही न।

Kabir das ji ke dohe

कबीरा जब हम पैदा हुए , जग हँसे हम रोये ,
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।

अर्थ :  कबीर कहते है कि जब हम इस संसार में पैदा होते है तो लोग हँसते है और हम रोते है पर इस संसार में ऐसा कुछ करके जाओ कि जब आपकी मृत्यु का समय आये तो सब रोये और हम ख़ुशी ख़ुशी इस संसार से विदा हो।

Kabir Das ke dohe with meaning

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ :  इसमें कवि कबीरदास जी ने बताया है कि सज्जन व्यक्ति कभी अपना भला स्वभाव नहीं छोड़ता चाहते वो कितने ही करोड़ों दुष्ट पुरुषों से क्यों न मिले। चन्दन के वृक्ष से हमेशा सांप लिपटे रहते है उसके बावजूद भी वो अपनी शीतलता कभी नहीं छोड़ता।

Kabir jee ke dohe

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