श्री हरमंदिर साहिब का इतिहास और कुछ रोचक बाते | History of Golden Temple in Hindi

History of Golden Temple in Hindi

नाम-  श्री दरबार साहिब / श्री हरमंदिर साहिब / स्वर्ण मंदिर / Golden Temple

स्थान–  अमृतसर ( पंजाब )

द्वार–  चार

गुरुद्वारे की नींव रखवाई–  सूफी संत मियां मीर ने

निर्माण शुरु करवाया–  श्री  गुरु रामदास जी

श्री दरबार साहिब को पूरा करवाया–  श्री गुरु अर्जुन देव जी ने

लंगर–  24 घंटे

श्री हरमंदिर साहिब का इतिहास (History of Shri Harmandir Sahib and Golden Temple in Hindi)

अमृतसर में स्थित श्री दरबार साहिब सिखों का पवित्र धार्मिक स्थल है इसमें चार द्वार है जोकि इस बात को उजागर करते है कि यहां किसी भी धर्म के लोग माथा टेकने आ सकते है। सिखों के चौथे गुरु रामदास जी ने दरबार साहिब की नींव रखी थी परन्तु कुछ स्रोतों में यह कहा गया है कि गुरु जी ने सूफी संत मियां मीर से 1588 में हरमंदिर साहिब की नींव रखवाई थी।

स्वर्ण मंदिर को कई बार नुक्सान पहुंचाया गया परन्तु भक्ति और आस्था के कारण सिक्खों ने इसे दोबारा बनाया। सरदार जस्सा सिंह अहलुवालिया ने हरमंदिर साहिब को दुबारा वर्तमान स्वरूप देने में अपना योगदान दिया। इसके अलावा अफगान हमलावरों ने इसे बहुत क्षति पहुंचाई इन सभी घटनाओ को स्वर्ण मंदिर में दर्शाया गया है इस पवित्र गुरूद्वारे को महाराजा रणजीत ने सोने के परत से सजाया था।

करीबन 400 साल पुराने इस धार्मिक स्थल का नक्शा सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव जी ने तैयार किया था जोकि शिल्प कला की अनूठी मिसाल है विश्व प्रसिद्ध हरमंदिर साहिब पवित्रता और सुंदरता की अनूठी मिसाल है इसमें चार द्वार है जोकि चारों दिशाओ में खुलते है उस समय देश में चार मुख्य जातियां थी और भेदभाव के कारण कुछ धार्मिक स्थलों में कई तरह की जातियों को जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन स्वर्ण मंदिर के यह चारों दरवाजे उन चारों जातियों को यहां आने के लिए आमंत्रित करते थे। यहां हर धर्म के अनुयायी का स्वागत किया जाता है।

श्री दरबार साहिब सफेद संगमरमर से बना हुआ है और दीवारों हर सोने की पत्तियों से अनूठी नक्काशी की गई है और यहां सारा दिन गुरबाणी और कीर्तन की लहरें गूंजती रहती है जिसे सुनकर मन को असीम शांति मिलती है।

सरोवर

हरिमंदिर साहिब सरोवर के बीचो बीच बना हुआ है इस सरोवर में श्रद्धालु स्नान करते है सरोवर का पानी फिल्टरों की सहायता से लगभग रोज बदला जाता है और कुछ सालों के अंतराल में पूरे सरोवर को अच्छी तरह से साफ़ किया जाता है और साथ ही उसकी मुरम्मत करवाई जाती है सेवादारों के साथ साथ आम संगत भी सरोवर की सफाई में अपना पूरा योगदान देती है।

गुरूद्वारे से 100 मी. की दूरी पर स्वर्ण जड़ि‍त, अकाल तख्त साहिब है। जहां पर सरबत खालसा की बैठक होती है और कई अहम फैसले लिए जाते है।

दुखभंजनी बेरी

श्री दरबार साहिब में दुखभंजनी बेरी है दुखभंजनी बेरी से जुड़ा इतिहास ये है कि सेठ दुनी चंद ने अपनी बेटी का विवाह कोढ़ी व्यक्ति से कर दिया था और अपनी बेटी को घर से निकाल दिया था जब वो लड़की अपने पति को उसी जगह बिठाकर भोजन की तलाश में निकलती है और उसके बाद वो व्यक्ति अद्भुद चमत्कार देखता है वह देखता है कि एक कौआ आया जब उसने डुबकी लगाई तो वह सफेद हंस बनकर बाहर निकला यह देखकर कोढ़ी व्यक्ति के मन में विचार आया कि अगर वो इस तालाब में नहाये तो उसे अपने कोढ़ से निजात मिल जाएगी और उसने ऐसा ही किया वो रेंगता हुआ तालाब में पहुंचा और निशानी के तोर पर अपने एक हाथ के अंगूठे को पानी नहीं लगने दिया ताकि उसकी पत्नी उसे पहचान सके उस तालाब में स्नान करने से उसका सारा कोढ़ दूर हो गया जब रजनी लौटकर आई तो वो बड़ी विस्मित हुई।

उसने यह अद्भुद घटना श्री गुरू रामदास जी को बताई और रजनी के पति का अंगूठा भी तालाब में स्नान करने पर अरोग हो गया। इस स्थान की बेरी के वृक्ष का नाम उसी दिन से ही दुख भंजनी बेरी प्रसिद्ध हो गया।

महत्वपूर्ण बातें

1.) श्री दरबार साहब में विश्व की सबसे बड़ी किचन है यहां करीबन 1 लाख से भी ज्यादा श्रद्धालुओं को लंगर करवाया जाता है इस किचन में बहुत बड़े बड़े कड़ाहे है जिसमे एक बार में करीबन 6 , 7 कविण्टल दाल और बादाम वाली खीर बनाई जाती है।

2.) मशीन की सहायता से एक घंटे में 4000 रोटियां तैयार की जाती है। और इन सभी रोटियां पर देसी घी का इस्तेमाल किया जाता है। हरमंदिर साहिब गुरूद्वारे में खाना बनाते समय हर रोज करीबन 100 एलपीजी सिलिंडर्स और 5000 किलो लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है यहां पर दो लंगर हॉल है जिस में एक बार में करीबन 5000 श्रदालु खाना खा सकते है। गुरूद्वारे में लगी आटा पीसने वाली मशीन एक दिन में 12,000 किलो तक आटा पीस सकती है। लंगर के बाद खाने के बर्तनों को 4 से 5 बार धोया जाता है। इसमें आम संगत अपना पूरा सहयोग करती है। यहां तक कि गुरूद्वारे में से हर रोज कई अस्पतालों में भी लंगर पहुँचाया जाता है ।

3.)  सिख धर्म की आस्था से जुड़े इस गुरूद्वारे में बैसाखी, प्रकाशोत्सव, लोह़ड़ी, संक्रांति, शहीदी दिवस जैसे त्योहार काफी धूमधाम से मनाए जाते हैं। वैसे तो हर रोज ही गुरूद्वारे में बहुत बड़ी संख्या में संगत हरमंदिर साहिब के दर्शन के लिए आती है परन्तु किसी ख़ास पर्व पर श्रद्धालुओं का जमावड़ा देखने योग्य होता है। साथ ही गुरुपूर्व जैसे मोके पर गुरूद्वारे को कई तरह के फूलों और बेहद बारीकी से सजाया जाता है। वहीं इस पवित्र गुरुद्धारा में श्रद्धालुओं को कई नियमों का भी पालन भी करना होता है।

4.) गुरूद्वारे के परिसर में सिर ढककर जाने की इजाजत है स्कार्फ या फिर रुमाल, दुपट्टा आदि बांधकर ही इसमें अंदर प्रवेश किया जा सकता है।

5.) दरबार साहब हर समय रौशनी से जगमगाता रहता है किसी बैसाखी, प्रकाशोत्सव या कुछ अन्य त्योहारों पर तो हरमंदिर साहब की सजावट देखने योग्य होती है।

कैसे पहुंचे ?

अमृतसर में स्थित गोल्डन टेम्पल में आप वायु, सड़क एवं रेल तीनों मार्गों द्धारा पहुँच सकते है दिल्ली से अमृसतर के लिए शान-ए-पंजाब या शताब्दी ट्रेन से पांच से सात घंटे में अमृतसर पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा अमृतसर पहुँचने के लिए बहुत सी बसें और ट्रेनें उपलब्ध है इसलिए आप आसानी से अमृतसर पहुँच सकते हो और अमृतसर गुरूद्वारे में श्रद्धालुओं के रहने के लिए भी अच्छी व्यवस्था है।

अमृतसर से लगभग 27 किलोमीटर की दूरी पर बाघा बॉर्डर है जहां पर आप तरह तरह के रंगारंग समारोह का आंनद ले सकते है शाम के समय बाघा बॉर्डर पर होने वाली परेड में बहुत भारी संख्या में लोग शामिल होते है। यह समारोह हर रोज शाम में सूर्यास्त से पहले आयोजित होता है। जिसमें सैनिकों द्वारा देशभक्ति का प्रदर्शन किया जाता है।

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